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Wednesday, August 8, 2007

Microsilica

Microsilica
Posted by ।। ध्यानेन्द्र मणि त्रिपाठी ।। Dhyanendra M. Tripathi ।। at 4:35 AM 1 comment:
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  • ▼  2007 (1)
    • ▼  August (1)
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About Me

।। ध्यानेन्द्र मणि त्रिपाठी ।। Dhyanendra M. Tripathi ।।
ज़ब किसी से कोई गिला रखना सामने अपने आईना रखना॰॰॰ वो अनगिनत आँखें हमारे लिए आइना हैं जिनमें मैं रोज़ उतरता हूँ॰ ठिठक जाता हूँ हर उन गलियों से गुजरते हुए जहाँ नीम अँधेरा और सीलन आवाज़ों को नम किया करते हैं॰ उन सर्पीली पगडंडियों के पार खेतों के हरे अक्स देख बल्लियों उछलता हूँ जब पपीहे की पियु और चिड़ियों की चहचहाहट कानों में मिसरी सी घोलती है॰ शहर की भीड़ में हजारों सवाल मेरा पीछा करते हैं और खुद मैं एक सवाल बन जाता हूँ॰ मैं किसके बरक्स चूमता हूँ साहिल को और सूरज छूने की तमन्ना रखता हूँ? अक्सर खुद से ये पूछता हूँ कि मैं कौन हूँ और शायद यही दुनिया का सबसे मुश्किल सवाल है॰ हर अनजाने आँसू के कतरे पर मेरा रोना ही मैं हूँ, किसी नितान्त अज़नबी की खुशी में शरीक इक भोली सी मुस्कुराहट हूँ या फिर इस दुनिया की मिट्टी का वो तमाम हिस्सा हूँ जो हर पहली बारिश के बाद महमहाता है॰॰॰ फिलहाल मुझे आदमी होने पर गर्व है, सुकून है और खुशी इस बात की कि मैं हिन्दुस्तान में बसता हूँ॰ इसकी रगों में बहता हूँ पनीले सपनों कि तरह॰॰॰
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